कलम उठा ही ली है तो धर्म लिखूंगा,
वेदों का ज्ञान, गीता का मर्म लिखूंगा...
मात्र कविताएं लिख देने से सैलाब नहीं आते,
बस मुट्ठियाँ भींच लेने से इन्कलाब नहीं आते,
इन्कलाब आते हैं अविरल उद्यम से, श्रम से,
सदा सत्य समर्पित निरंतर साधना के क्रम से,
उद्वेलित होना काफी नहीं, अब कर्म करो,
राष्ट्र-हित में जीओ, राष्ट्र-हित ही धर्म करो,
राष्ट्र सर्वोपरि है, यही महाभारत औरगीता का सार है,
इसकी रक्षा में पितामह इश्वर से भी लड़ने को तैयार है !
कर्महीन और पलाए को नपुंसक बताया था,
बंसी छोड़ कृष्ण ने रणभेरी शंख बजाया था !
इसलिए खाली मत बैठो, यौवन न गंवाओ,
ओ गर्म खून वालों ! माँ की लाज बचाओ !
हर ह्रदय को जोश से भर दो,
जय हिंद बोलो नहीं, कर दो

लेखक
सीरवी सुखाराम s/o हीरालालजी सोलंकी
श्री सीरवी सेवा मंण्डल विल्लिवाकम चेन्नई
मरुधर में ( कुशालपुरा रायपुर मारवाड़ )

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